बॉल्बी का लगाव सिद्धांत – संक्षेप में और काम की बातें
«चिंतित» और «परिहारी» जैसे शब्द कहाँ से आए और उनके पीछे क्या है। संक्षेप में बताते हैं कि लगाव सिद्धांत ने बच्चों के अवलोकन से लेकर बड़ों के आधुनिक टेस्ट तक का सफ़र कैसे तय किया।
जॉन बॉल्बी: सुरक्षा की व्यवस्था के रूप में लगाव
ब्रिटिश मनोचिकित्सक और मनोविश्लेषक जॉन बॉल्बी ने 1950–60 के दशक में माता-पिता से बिछड़े बच्चों के साथ काम किया। उन्होंने देखा कि उनकी प्रतिक्रियाएँ – रोना, ढूँढना, फिर निराशा और अलगाव – आपस में इतनी मिलती-जुलती थीं कि उन्हें संयोग नहीं माना जा सकता था।
बॉल्बी ने यह विचार रखा कि बच्चे में लगाव की एक जन्मजात व्यवस्था होती है। उसका काम सीधा है – रक्षा करने वाले बड़े के करीब रहना। जब डर लगता है, व्यवस्था जाग उठती है: बच्चा माँ की ओर बढ़ता है, पुकारता है, हाथ पकड़ लेता है। जब बड़ा पास हो और ध्यान दे, व्यवस्था शांत हो जाती है, और बच्चा फिर से दुनिया को खोजने लगता है।
अपने विचार बॉल्बी ने «Attachment and Loss» (लगाव) त्रयी में रखे, जो 1969 से 1980 के बीच प्रकाशित हुई। वहाँ से एक अहम विचार: बार-बार के अनुभव से बच्चा भीतरी मॉडल बनाता है – ये उम्मीदें कि क्या मदद मिलेगी और क्या वह इस मदद के लायक है।
मैरी एन्सवर्थ और «अजनबी स्थिति»
अमेरिकी-कनाडाई शोधकर्ता मैरी एन्सवर्थ ने, जो बॉल्बी की सहयोगी थीं, 1970 के दशक में एक प्रयोग से उनके विचारों को परखा। इसे «अजनबी स्थिति» (Strange Situation) कहा गया: माँ और लगभग एक साल का बच्चा खिलौनों वाले अनजान कमरे में आते हैं, माँ थोड़ी देर के लिए बाहर जाती है, एक अजनबी अंदर आता है, फिर माँ लौट आती है।
सबसे दिलचस्प बात मिलने के पल में होती थी। कुछ बच्चे माँ के जाने पर उदास होते, और लौटने पर जल्दी शांत होकर फिर खेलने लगते – इस रूप को सुरक्षित कहा गया। कुछ ऐसे लगते मानो न जाना देखा, न लौटना, हालाँकि शारीरिक संकेतों से वे भी बेचैन थे – परिहारी रूप। तीसरे बहुत रोते और गोद में आने के बाद भी देर तक शांत नहीं होते, एक साथ चिपकते भी और गुस्सा भी होते – उभयभावी (ambivalent)।
बाद में मैरी मेन और जूडिथ सोलोमन ने चौथे, असंगठित (disorganized) रूप का वर्णन किया: बच्चा विरोधाभासी व्यवहार करता है, मानो बड़े की ओर खिंचता भी है और उससे डरता भी है।
ये अवलोकन आज भी अहम हैं। इन्होंने दिखाया कि माँ से मिलने पर बच्चे का व्यवहार उसके «स्वभाव» पर नहीं, बल्कि इस पर निर्भर करता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बड़े उसके संकेतों पर कितने अनुमान-योग्य ढंग से ध्यान देते थे।
हेज़न और शेवर: बचपन से बड़ों के प्यार तक
1987 में सिंडी हेज़न और फ़िलिप शेवर ने एक साहसी सवाल पूछा: क्या हो अगर बड़ों का रोमांटिक प्यार भी लगाव का ही एक रूप हो? उन्होंने एक अख़बार में प्रेम-अनुभव के बारे में छोटी-सी प्रश्नावली छापी और ढेरों जवाब पाए।
पता चला कि बड़े अपने रिश्तों का वर्णन लगभग वैसे ही करते हैं, जैसे एन्सवर्थ ने बच्चों का किया था। किसी के लिए करीब आना और भरोसा करना आसान है। किसी को फ़िक्र रहती है कि साथी कम प्यार करता है, और वह उसके साथ पूरी तरह एक हो जाना चाहता है। किसी को असहज लगता है जब कोई दूसरा बहुत करीब आ जाता है।
इसी काम से बड़ों के लगाव पर शोध शुरू हुए। साथी ही वह «सुरक्षित बड़ा» बन गया, जिसकी ओर हम मुश्किल में खिंचते हैं – जैसे, कठिन दिन के बाद फ़ोन करते हैं या किसी अहम बातचीत से पहले सहारे का इंतज़ार करते हैं।
शोधकर्ताओं ने एक फ़र्क भी देखा: बच्चे का लगाव आमतौर पर एकतरफ़ा होता है, जबकि बड़ों का – आपसी। साथी बारी-बारी से एक-दूसरे का सहारा बनते हैं: आज आप सहारा देते हैं, कल आपको मिलता है।
बार्थोलोम्यू और होरोविट्ज़: बड़ों के चार प्रकार
1991 में किम बार्थोलोम्यू और लियोनार्ड होरोविट्ज़ ने चार प्रकारों का एक मॉडल रखा। इसके मूल में दो सवाल हैं: इंसान खुद को कैसे देखता है (क्या वह प्यार के लायक है) और दूसरों को कैसे देखता है (क्या उन पर भरोसा किया जा सकता है)।
इस तरह चार मेल बने। सुरक्षित प्रकार – अपने बारे में भी अच्छी राय, दूसरों के बारे में भी। व्यस्त-चिंतित (preoccupied), यानी चिंतित – दूसरे अच्छे हैं, पर खुद को आसानी से नाकाफ़ी मान लिया जाता है। खारिज करने वाला परिहारी (dismissing) – खुद पर भरोसा किया जा सकता है, पर दूसरों पर नहीं। भयभीत-परिहारी (fearful) – नज़दीकी चाहिए, पर न खुद पर भरोसा आसान है, न दूसरों पर।
इस मॉडल ने एक अहम बात दिखाई: परिहार अलग-अलग तरह का होता है। एक इंसान शांति से दूरी रखता है और कहता है «मैं ऐसे ही ठीक हूँ», दूसरा इसलिए दूर हटता है क्योंकि उसे दर्द से बहुत डर लगता है।
डिब्बों की जगह दो पैमाने
1998 में केली ब्रेनन, कैथरीन क्लार्क और फ़िलिप शेवर ने बहुत-सी प्रश्नावलियों का सार निकाला और इस नतीजे पर पहुँचे: इन सबके पीछे दो मुख्य पैमाने हैं। पहला – चिंता, यानी ठुकराए जाने का डर। दूसरा – परिहार, यानी नज़दीकी और निर्भरता से असहजता।
तब से लगाव को अक्सर चार डिब्बों में से एक नहीं, बल्कि दो अक्षों वाले तल पर एक बिंदु की तरह समझाया जाता है। ज़्यादा चिंता वाला इंसान चैट दोबारा पढ़ता है और सोचता है कि जवाब इतना छोटा क्यों है। ज़्यादा परिहार वाले इंसान को घिरा हुआ महसूस होता है, जब साथी साथ रहने या पूरा वीकेंड साथ बिताने का सुझाव देता है।
हमारा टेस्ट इसी दो-आयामी मॉडल पर बना है, पर उसके सवाल मौलिक हैं। चार प्रकार – सुरक्षित, चिंतित, परिहारी और भयभीत-परिहारी – तल पर क्षेत्र हैं, और प्रतिशत दिखाते हैं कि आप ठीक-ठीक कहाँ हैं।
यह तरीका ज़्यादा सुविधाजनक और सटीक है। एक ही प्रकार के दो लोग बहुत अलग हो सकते हैं: एक में चिंता औसत से मुश्किल से ऊपर है, दूसरे में वह लगभग हर बातचीत तय करती है।
तरीके की ईमानदार सीमाएँ
लगाव के बारे में हर प्रश्नावली आत्म-मूल्यांकन है। यह दिखाती है कि आप खुद अपनी भावनाओं और व्यवहार को कैसे देखते हैं, और यह मूड पर, इस पर कि आप किस रिश्ते के बारे में सोच रहे हैं, और खुद के साथ ईमानदार होने की तैयारी पर निर्भर करता है।
प्रकार हमेशा के लिए तय नहीं होता। एक साथी के साथ इंसान सुकून महसूस कर सकता है, और दूसरे के साथ लगातार चिंता में रह सकता है। मुश्किल ब्रेकअप के बाद चिंता अक्सर बढ़ जाती है, और लंबे, परवाह भरे रिश्ते में धीरे-धीरे घटती है।
टेस्ट का परिणाम न निदान है, न चिकित्सीय राय। यह इंसान को पूरी तरह नहीं समझाता: उसके बाहर स्वभाव, मूल्य, ज़िंदगी का अनुभव, बात तय कर पाने का हुनर – सब रह जाते हैं। अगर कुछ विषय खास तौर पर दर्द देते हैं, तो उन पर मनोवैज्ञानिक से बात करना फ़ायदेमंद है – टेस्ट का परिणाम ऐसी बातचीत की अच्छी शुरुआत बन सकता है।
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